Pen hospital: वो दौर… जब पेन यानि कलम भी बीमार पड़ते थे और उनका होता था इलाज!,‘कलम हॉस्पिटल’? कि अनसुनी कहानियां

आइए जानते है पेन हॉस्पिटल की कहानी, जिसे आज की पीढ़ी शायद ही जानती हो ….. क्याआज के बच्चों को यकीन होगा कि कभी पेन खराब होने पर उसे फेंका नहीं जाता था? उसे लेकर लोग अस्पताल जाते थे… जी हां, ‘पेन हॉस्पिटल’। जहां आपका पसंदीदा पेन फिर से जिंदा हो जाता था।
आज पेन की रिफिल खत्म होती है तो हम नया पेन खरीद लेते हैं। पेन खराब हो जाए तो उसे कूड़ेदान में डाल देते हैं। लेकिन एक दौर ऐसा भी था, जब पेन सिर्फ लिखने की चीज नहीं था—वह लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा था।और जब वह खराब होता था, तो उसका इलाज कराया जाता था।
सुबह से शाम तक चलता था ‘इलाज’
क्या आपने फाउंटेन पेन से लिखा है?
क्या आपकी उंगलियां भी स्याही से नीली हुई हैं?
क्या आपका पेन भी कभी “स्याही पोंकता” था?
क्या आपके घर में भी कभी पांच पैसे वाली स्याही की गोली घोली जाती थी?
और क्या आपको याद है वह छोटी-सी दुकान, जहां आपका पसंदीदा पेन फिर से जिंदा हो जाता था?
वो एक छोटी-सी स्टेशनरी की दुकान। सामने बैठे लोग, किसी के हाथ में टूटा हुआ पेन, किसी की निब खराब है और किसी का पेन जेब में स्याही फैला रहा है।
दुकानदार पेन को खोलता है। ….. निब देखता है। ….. रीड जांचता है। …… कहीं सफाई होती है, कहीं नया पुर्जा लगाया जाता है। ….. और थोड़ी देर बाद…. वही पुराना पेन फिर से लिखने लगता है। …… यही था उस दौर का मशहूर‘पेन हॉस्पिटल’।

“पेन स्याही पोंक रहा है।”
आज की पीढ़ी शायद इसका मतलब भी न समझे। इसका मतलब था कि पेन से स्याही रिस रही है और जेब, हाथ, कॉपी या कपड़े नीले हो रहे हैं।तब पेन को फेंकने का सवाल ही नहीं उठता था, पहले उसकी जांच होती थी, रीड पर वैसलीन लगाई जाती, जरूरत पड़ने पर रीड बदली जाती, और फिर पेन को दोबारा लिखने लायक बनाया जाता।
निब खराब हुई? इलाज है!
पेन की निब खराब हो गई तो पहले उसे ठीक करने की कोशिश की जाती थी। सफाई होती, घिसाई होती और अगर बात नहीं बनी तो नई निब लगा दी जाती।
ढक्कन खो गया?, मिल जाएगा।…. क्लिप टूट गई?, बदल जाएगी।….. पेन का कोई पुर्जा खराब हो गया?, उसका भी इलाज होगा। ….. यानी उस दौर में पेन की लगभग हर समस्या का समाधान मौजूद था।
पांच पैसे में भरती थी स्याही
आज पांच पैसे में शायद कुछ भी नहीं मिलता। लेकिन एक समय ऐसा था जब महज पांच पैसे खर्च करके पेन में स्याही भरवाई जा सकती थी।, स्टेशनरी की दुकानों पर लोग पेन लेकर पहुंचते और स्याही भरवाकर वापस जाते।
कुछ लोग पूरी दवात खरीदते थे, जबकि आम परिवारों में स्याही की गोली या पाउडर खरीदकर घर पर ही स्याही तैयार की जाती थी।
घर में शीशी, पानी और स्याही का पाउडर…और फिर शुरू होता था असली काम।चाहे कितनी भी सावधानी बरत ली जाए—उंगलियां नीली होना तय था, कभी हाथ, कभी कपड़े,और कभी पूरी जेब पर स्याही के निशान।
स्कूल की जेब और नीली उंगलियां
वह फाउंटेन पेन का दौर था।स्कूल जाने वाले बच्चों के हाथों में फाउंटेन पेन होता था और जेब पर स्याही का दाग मिल जाना कोई बड़ी बात नहीं थी।आज के बच्चों के लिए यह शायद अजीब हो, लेकिन उस दौर में स्याही भरना, पेन की निब साफ करना और पेन को संभालकर रखना रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा था।पेन सिर्फ इस्तेमाल करने की चीज नहीं था।उसे संभाला जाता था।
महंगे पेन और आम लोगों की पसंद
उस दौर में बड़े अधिकारी और संपन्न लोग महंगे ब्रांड के फाउंटेन पेन इस्तेमाल करते थे। वहीं आम और मध्यमवर्गीय परिवारों के बीच दूसरे लोकप्रिय पेन का इस्तेमाल होता था।
लेकिन पेन चाहे महंगा हो या साधारण…खराब होने पर उसका इलाज जरूर कराया जाता था।
आज फेंक देते हैं, तब ठीक कराते थे
रिफिल खत्म—नया पेन।, पेन खराब—दूसरा खरीद लो।, लेकिन पहले चीजों को जल्दी फेंका नहीं जाता था। उन्हें ठीक किया जाता था और फिर लंबे समय तक इस्तेमाल किया जाता था।
‘पेन हॉस्पिटल’ सिर्फ पेन की मरम्मत की जगह नहीं था, बल्कि उस दौर की सोच का प्रतीक था—चीज खराब हो जाए तो उसे फेंको मत, पहले उसे ठीक करने की कोशिश करो।
