China accused of failing to issue a timely alert: 469 मौतें, 977 लापता; चीन पर समय रहते अलर्ट न देने के आरोप, दूतावास ने किया खंडन

काठमांडू। नेपाल में आई भीषण फ्लैश फ्लड ने भारी तबाही मचाई है। बाढ़ से मरने वालों की संख्या बढ़कर 469 हो गई है, जबकि अधिकारियों के मुताबिक 977 लोग अब भी लापता हैं। इनमें 517 विदेशी नागरिक शामिल बताए जा रहे हैं। राहत और बचाव अभियान लगातार जारी है और नेपाल की सेना समेत सुरक्षा बलों के हजारों जवान प्रभावित इलाकों में तैनात हैं।
इस प्राकृतिक आपदा के बाद अब चीन की भूमिका को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। आरोप है कि नेपाल को आपदा से पहले समय रहते पर्याप्त सूचना या चेतावनी नहीं दी गई। हालांकि, नेपाल स्थित चीनी दूतावास ने सोशल मीडिया पर चल रहे इन दावों को खारिज करते हुए उन्हें फर्जी बताया है।
चीन पर क्यों उठ रहे सवाल?
नेपाल में बाढ़ के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर यह आपदा शुरू कहां से हुई और क्या नेपाल को इसकी पहले से जानकारी मिल सकती थी?, सीमा क्षेत्र में संचार व्यवस्था बाधित होने और प्रभावित इलाकों से संपर्क टूटने के कारण शुरुआती दौर में बाढ़ के वास्तविक स्रोत को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं थी।
काठमांडू पोस्ट के मुताबिक, ल्हासा में नेपाल के कॉन्सल जनरल लक्ष्मी प्रसाद निरौला ने बताया कि नेपाल और चीन के अधिकारी सीमा पर तैनात सुरक्षा कर्मियों से संपर्क स्थापित नहीं कर पा रहे थे। इस वजह से बाढ़ की शुरुआत और उसके वास्तविक कारण को लेकर तत्काल विश्वसनीय जानकारी हासिल करना मुश्किल हो गया था।
चीनी दूतावास ने आरोपों को बताया फेक
बाढ़ के बाद सोशल मीडिया पर ऐसी खबरें वायरल हुईं, जिनमें दावा किया गया कि चीन ने नेपाल को हादसे से पहले चेतावनी नहीं दी थी।, नेपाल स्थित चीनी दूतावास ने इन दावों का खंडन किया। दूतावास ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए कहा कि सीमा क्षेत्र में अचानक आई बाढ़ और उससे जुड़ी प्राकृतिक घटनाओं में दोनों तरफ लोगों की जान गई और कई लोग लापता हुए। चीनी पक्ष ने यह भी कहा कि भविष्य में मौसम, जल विज्ञान और भूगर्भीय जोखिमों से जुड़ी सूचनाओं के आदान-प्रदान को बेहतर बनाया जाएगा, खासकर उन आपदाओं के मामलों में जिनका असर सीमा पार दोनों देशों पर पड़ सकता है।
आपदा से पहले चेतावनी क्यों महत्वपूर्ण थी?
नेपाल और चीन की सीमा से लगे हिमालयी क्षेत्र में भूस्खलन, हिमस्खलन और अचानक बाढ़ जैसी घटनाओं का खतरा रहता है। ऐसे इलाकों में किसी नदी या पहाड़ी क्षेत्र में अचानक होने वाले बदलाव की जानकारी समय रहते नीचे बसे इलाकों तक पहुंचाना बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है। यही वजह है कि नेपाल में अब चीन के साथ रियल-टाइम आपदा सूचना साझा करने की व्यवस्था को मजबूत करने की मांग उठ रही है।
हालांकि, उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह निश्चित रूप से कहना अभी संभव नहीं है कि यदि पहले चेतावनी मिल जाती तो कितनी जानें बचाई जा सकती थीं। इसके लिए बाढ़ की वास्तविक शुरुआत, सूचना उपलब्ध होने का समय और चेतावनी जारी करने की क्षमता जैसे कई पहलुओं की जांच जरूरी होगी।
नेपाल में 13 हजार से ज्यादा सुरक्षाकर्मी तैनात
भीषण बाढ़ के बाद नेपाल में बड़े पैमाने पर राहत और बचाव अभियान चलाया जा रहा है। 13 हजार से अधिक सुरक्षाकर्मियों को खोज, बचाव और राहत कार्यों में लगाया गया है।
नेपाल की सेना ने अब तक सैकड़ों लोगों को सुरक्षित बचाया है। प्रभावित क्षेत्रों में फंसे लोगों को निकालने के साथ-साथ लापता लोगों की तलाश भी जारी है। बाढ़ के कारण कई इलाकों में सड़क, संचार और अन्य बुनियादी सुविधाएं प्रभावित हुई हैं, जिससे राहत अभियान के सामने अतिरिक्त चुनौतियां खड़ी हो रही हैं।
पूर्व प्रधानमंत्री प्रचंड ने उठाया सूचना साझा करने का मुद्दा
नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहाल ‘प्रचंड’ ने भी चीन के साथ आपदा संबंधी सूचनाओं के आदान-प्रदान का मुद्दा उठाया है। ‘ऑनलाइन खबर’ के मुताबिक, गुरुवार को हुई सर्वदलीय बैठक में प्रचंड ने रसुवा में बाढ़ की स्थिति को देखते हुए चीन के साथ आपदा संबंधी सूचना साझा करने की व्यवस्था को प्राथमिकता देने की जरूरत बताई। उनका कहना है कि सीमा क्षेत्र में भविष्य में ऐसी आपदाओं से निपटने के लिए दोनों देशों के बीच सूचना का तेज और प्रभावी आदान-प्रदान जरूरी है।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी चर्चा
नेपाल की बाढ़ के बाद चीन की भूमिका को लेकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया और क्षेत्रीय समाचार माध्यमों में भी चर्चा हो रही है। सवाल मुख्य रूप से सीमा पार आपदा की स्थिति में पूर्व चेतावनी और सूचना साझा करने की व्यवस्था से जुड़े हैं। दूसरी तरफ चीन ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि वह नेपाल को हरसंभव सहायता उपलब्ध कराने के लिए तैयार है और भविष्य में दोनों देशों के बीच आपदा संबंधी समन्वय को और मजबूत किया जाना चाहिए।
असली वजह पर अभी भी कई सवाल
बाढ़ के बाद राहत और बचाव कार्य के साथ-साथ वैज्ञानिक और प्रशासनिक स्तर पर आपदा के वास्तविक कारणों को समझने की कोशिश भी जारी है। सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि बाढ़ का शुरुआती ट्रिगर क्या था, सीमा के किस हिस्से से पानी और मलबे का बहाव शुरू हुआ और क्या इसकी पूर्व चेतावनी संभव थी। इन सवालों के स्पष्ट जवाब विस्तृत जांच और प्रभावित क्षेत्र से विश्वसनीय तकनीकी जानकारी मिलने के बाद ही सामने आ सकेंगे।
फिलहाल नेपाल में प्राथमिकता लापता लोगों की तलाश, प्रभावित लोगों को सुरक्षित निकालना और राहत पहुंचाना है। वहीं, चीन के साथ आपदा संबंधी सूचना साझा करने की व्यवस्था को लेकर उठी मांग इस त्रासदी के बाद एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक और आपदा-प्रबंधन मुद्दा बन गई है।
