Teejan Bai, Pandwani: जब तंबूरा गदा बन जाता था और आवाज में गूंजता था महाभारत… खामोश हुई पंडवानी की ‘तीजन हुंकार’, तीजन बाई के जाने से सूना हुआ पंडवानी का मंच

रायपुर: छत्तीसगढ़ की लोक गायिका डॉ. तीजन बाई ने अपनी अनोखी कापालिक शैली, दमदार गायन और सशक्त अभिनय के जरिए पंडवानी को छत्तीसगढ़ के गांवों की चौपालों से निकाल कर देश-दुनिया के बड़े मंचों तक पहुंचाया। महाभारत की कथाओं को प्रस्तुत करने की उनकी शैली इतनी प्रभावशाली थी कि मंच पर वे केवल कथा सुनाती नहीं थीं, बल्कि पात्रों को अपने अभिनय के माध्यमसे जीवंत कर देती थीं।
मंच पर एक महिला खड़ी होती थी… हाथ में तंबूरा होता था… और फिर जैसे ही उनकी आवाज गूंजती—महाभारत का पूरा संसार जीवंत हो उठता था। कभी वह भीम की गर्जना बन जातीं, कभी अर्जुन का संकल्प, तो कभी युद्धभूमि की हुंकार। डॉ. तीजन बाई सिर्फ पंडवानी नहीं गाती थीं, वह महाभारत को मंच पर जीती थीं।
छत्तीसगढ़ की इसी महान लोकगायिका ने 70 वर्ष की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया। रायपुर के एम्स में इलाज के दौरान उनका निधन हुआ। उनके जाने के साथ सिर्फ एक कलाकार नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति की एक ऐसी बुलंद आवाज खामोश हो गई, जिसने पंडवानी को गांव की चौपाल से उठाकर देश और दुनिया के बड़े मंचों तक पहुंचाया।
तंबूरा हाथ में आते ही बदल जाती थीं तीजन बाई
तीजन बाई की प्रस्तुति को देखना महाभारत की कथा सुनने से कहीं ज्यादा बड़ा अनुभव होता था। उनके हाथ में मौजूद तंबूरा सिर्फ वाद्य यंत्र नहीं रहता था। प्रस्तुति के दौरान वही कभी भीम की गदा बन जाता, तो कभी अर्जुन का धनुष। आवाज में ऐसी ताकत कि पात्रों के संवाद सुनाई नहीं देते थे, बल्कि सामने घटित होते हुए महसूस होते थे। उनकी आंखों के भाव, शरीर की मुद्राएं, संवाद अदायगी और वह खास गरजदार हुंकार—यही उनकी कला की पहचान थी।

कापालिक शैली ने बनाया उन्हें सबसे अलग
पंडवानी की दुनिया में तीजन बाई की सबसे बड़ी पहचान उनकी कापालिक शैली रही। इस शैली में कलाकार कथा को केवल गाकर नहीं सुनाता, बल्कि पात्रों को अपने अभिनय और हाव-भाव के जरिए मंच पर उतार देता है। तीजन बाई ने इस शैली को अपनी आवाज और अदाकारी से ऐसा प्रभाव दिया कि दर्शक कुछ देर के लिए मंच और कथा के बीच का फर्क भूल जाते थे। महाभारत के युद्ध, रिश्ते, संघर्ष, क्रोध और भावनाएं उनकी प्रस्तुति में इतने जीवंत हो उठते थे कि लोकगाथा एक दृश्य नाटक जैसी प्रतीत होती थी।
13 साल की उम्र से शुरू हुआ सफर, दुनिया तक पहुंची आवाज
तीजन बाई ने महज 13 वर्ष की उम्र में पंडवानी की दुनिया में कदम रखा। जिस लोककला की गूंज कभी छत्तीसगढ़ के गांवों और चौपालों तक सीमित थी, उसे उन्होंने अपनी प्रतिभा के बल पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया। देश के अलग-अलग हिस्सों के साथ विदेशों में भी उनकी प्रस्तुतियां हुईं। उनकी आवाज के साथ छत्तीसगढ़ की मिट्टी, लोकभाषा और संस्कृति भी दुनिया तक पहुंची। यही वजह है कि तीजन बाई का नाम सिर्फ एक लोकगायिका के रूप में नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान के रूप में लिया जाता है।
सम्मान भी झुका उनके हुनर के आगे
तीजन बाई के असाधारण योगदान को देश ने भी सम्मान दिया। उन्हें 1988 में पद्म श्री, 2003 में पद्म भूषण और 2019 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। ये पुरस्कार सिर्फ एक कलाकार के सम्मान नहीं थे। इनके जरिए पंडवानी जैसी लोक परंपरा और छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को भी राष्ट्रीय पहचान मिली।

आवाज चली गई, लेकिन हुंकार बाकी रहेगी
किसी लोककला की सबसे बड़ी ताकत उसका कलाकार नहीं, बल्कि वह विरासत होती है जिसे कलाकार आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़ जाता है। तीजन बाई ने पंडवानी को सिर्फ गाया नहीं—उसे जिया, उसे मंच दिया और उसे दुनिया तक पहुंचाया। उन्होंने साबित किया कि लोककला पुरानी जरूर हो सकती है, लेकिन उसकी आत्मा कभी पुरानी नहीं होती। आज तीजन बाई मंच पर नहीं हैं। तंबूरा उनके हाथ में नहीं है। वह गरजती हुई आवाज भी अब प्रत्यक्ष सुनाई नहीं देगी।
लेकिन जब भी पंडवानी में महाभारत की कोई कथा गूंजेगी, जब तंबूरा किसी कलाकार के हाथ में उठेगा और जब मंच पर भीम-अर्जुन जैसे पात्र जीवंत होंगे—तीजन बाई की वह हुंकार जरूर सुनाई देगी।
उनका जाना एक कलाकार का अंत है, लेकिन उनकी कला का नहीं। तीजन बाई की आवाज खामोश हुई है, पंडवानी की गूंज नहीं।
